स्वामी विवेकानंद वाले हिंदू कहां हैं?

इससे पहले कि स्वामी विवेकानंद वाले हिंदुओं पर कुछ चर्चा की जाए, 2014 के बाद ताजा-ताजा हिंदू बने हिंदुओं के आस्था के प्रतीक ” कहे जा रहे ” रामलला ” के ” मंदिर ” पर कुछ बात कर ली जाए। भूमिका थोड़ी लंबी रहेगी।

( जैसे कि कहा गया है” धरिए धीर, होइ हैं सूत चारी )

आज राम के नाम पर चंदा चोरों और उनके आकाओं पर प्रश्न उठने पर वही लोग चौंक सकते हैं, जिन्हें दिसंबर, 1949 में राम लला के ” प्रगटीकरण गिरोह ” के बारे में ना पता हो।

इस बारे में भारत ही नहीं दुनिया के जाने-माने एक्टिविस्ट, डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर आनंद पटवर्धन की 50 मिनट की फिल्म “राम के नाम” को देखे बिना पिछले 75 सालों से किए जा रहे षड्यंत्र की पूरी तस्वीर नहीं उभरती है।

इस शानदार डाक्यूमेंटरी फिल्म के सातवें मिनट में दिखाया गया है कि किस प्रकार रामलला का कथित पुजारी पूर्व कैदी अपना पाप स्वीकार रहा है।

1949 में जेल में बंद इस सजायाफ़्ता कैदी से तत्कालीन फैजाबाद के तत्कालीन डीएम के के नैयर ने चुपके से राम लल्ला की मूर्तियां रखवाई थीं। चौथी लोकसभा में केके नायर जनसंघ के टिकट पर लोकसभा में पहुंचे थे। फिल्म में आगे एक इनकम टैक्स कमिश्नर का भी बयान है, जिन्होंने विश्व हिंदू परिषद को कानून के हिसाब से 1989-90 का लेखा जोखा अपने सामने प्रस्तुत करने के लिए कानून के मुताबिक पेश होने के लिए लीगल नोटिस दिया था।

नोटिस देने के 24 घंटे के भीतर उन्हें सस्पेंड कर उनका तबादला दक्षिण भारत कर दिया गया था। उस समय लोकसभा में वित्त मंत्री को इस मसले पर हुए बवाल को शांत करने में नाकों चने चबाने पड़े थे। फिल्म में राम जन्मभूमि के पुजारी लाल दास का भी इंटरव्यू है जो बताते हैं कि विश्व हिंदू परिषद ने कभी भी मंदिर में एक माला तक नहीं चढ़ाई, बल्कि पूजा रुकवा दी थी, जिसे कोर्ट के आदेश से पुजारी ने खुद शुरू करवाया था। इस फिल्म के निर्माण के एक साल बाद पुजारी लाल दास की हत्या अज्ञात लोगों ने कर दी थी।

ध्यान रहे आनंद पटवर्धन अपनी कई तथ्यों पर आधारित डॉक्यूमेंट्री फिल्मों को 12-12 साल तक सेंसर बोर्ड से बिना एक भी कट के स्वीकृत करवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ चुके हैं। उनकी एक फिल्म ” फादर सन एंड होली वार” को हाल में ही (मोदी सरकार के इशारे पर !?) यूट्यूब के खरबपति विदेशी लाला द्वारा प्रतिबंधित कर दिया गया, और बवाल मचने पर रिस्टोर किया गया। उनकी इस फिल्म को एक यूरोपियन डॉक्यूमेंटरी पत्रिका 50 सर्वकालिक महान डॉक्यूमेंट्री फिल्मों में एक माना जाता है।

राम के नाम के प्रदर्शन को अमेरिका तक में आरएसएस ने रुकवाने की कोशिश की है।

वैसे भी दुनिया में हर जगह और हर समय धर्म की ठेकेदारों और शासकों का साथ रहा है। भारत में सिख, मुस्लिम आदि सारे ही धर्मों के धर्मस्थानो पर यही तो हो रहा है। ऐसे ही लोग काबिज हैं।

हरियाणा के गुंडे राम रहीम गुरमीत सिंह जब चाहे बाहर आते हैं, उमर खालिद, प्रोफेसर आनंद तेलतुंबडे (बाबा साहब की पोती के पति), वकील, मानवाधिकार कार्य करने वाले सुधा भारद्वाज और तमाम बुद्धिजीवी जेलों में सड़ते हैं।

जैसा कि इस देश में शहीद भगत सिंह के साथ होता आया है वही आज स्वामी विवेकानंद के साथ भी हो रहा है।

शहादत तक नास्तिक रहे भगत सिंह के राजनीतिक गुरु रूसी कामरेड लेनिन की शैली में कहें तो भगत सिंह और विवेकानंद आदि की केवल मूर्ति पूजा की जा रही है।

सभा में छोड़ दें, एक कमरे में भी किसी भी तथाकथित भाजपाई देशभक्त से भगत सिंह पर सिर्फ दो मिनट बोलने के लिए कहिए तो वह बगलें झांकने लगेगा, जबकि भगत सिंह की लिखी हुई चिट्ठियाँ, लेख और जेल डायरी सैकड़ों नहीं हजार पेजों तक हो जाती है।

इसी प्रकार स्वामी विवेकानंद का, उनके अमेरिका के भाषण का नाम रटने वाले लोग, आरएसएस के पोस्टर बॉय नहीं जानते कि स्वामी विवेकानंद पर 10 खंडों में लिखे गए “विवेकानंद साहित्य” की ही बात कर ली जाए तो कुल पेजों की संख्या लगभग चार हज़ार से ज़्यादा होगी। लेकिन हिन्दू धर्म के नाम पर गुंडई करने वाले अमेरिका में किए गए भाषण के शुरुआती शब्द “माई ब्रदर एंड सिस्टर” से आगे एक लाइन नहीं बोल सकते।

बात कर रहे हैं तो भाजपा के एक सफेद झूठ पर बात और कह दूं। स्वयं शहीद भगत सिंह के लुधियाना के निवासी उनके सगे भांजे प्रो जगमोहन सिंह बताते हैं कि गांधी ने एक नहीं पांच चिट्ठियां अंग्रेजों को लिखी थीं, जिसमें उन्होंने भगत सिंह की फांसी रोकने की बात की थी। इसी प्रकार नेहरू को भी बदनाम किया जाता है कि उन्होंने चंद्रशेखर आजाद के अल्फ्रेड पार्क में होने की सूचना अंग्रेजों को दी थी। जबकि यह कार्य भी वीरभद्र ने किया था।

खैर भूमिका बहुत लंबी हो गई सीधे-सीधे शीर्षक पर आया जाए। आज हिंदुस्तान में झगड़ा किस बात पर है ? रोजगार, इलाज, कुपोषण पर नहीं है। झगड़ा है अयोध्या पर, काशी पर, मथुरा पर। कह सकते हैं कि राम मंदिर, कृष्ण जन्म स्थान और श्मशान प्रेमी भोले बाबा के निवास स्थान माने जाने वाले काशी विश्वनाथ पर।

यहां एक सवाल उठता है कि स्वामी विवेकानंद की दृष्टि में हिंदू धर्म क्या था? भाजपा आरएसएस आदि आखिर विवेकानंद की मूर्ति पूजा ही करते हैं न।

अमेरिका में उनके द्वारा धर्म महासभा में दिए गए कई लेक्चर और उसके बाद भी दिए गए सैकड़ों भाषणों, दर्जनों पत्रों, निजी  बातचीत में उन्होंने हिंदू धर्म का सार किसे बताया था?  स्वामी विवेकानंद की दृष्टि में हिंदू धर्म का सार “वेदांत दर्शन ” था यानि “सिया राम मय सब जग जानी!” यानि अनल हक की सूफी परंपरा, जिसे अहम् ब्रह्मास्मि, तत्वमसि,  आदि चार महा वाक्यों से जाना जाता है।

स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि वेदांत की उच्चतम व्याख्या करने वाला ग्रंथ एक श्रीमद् भगवत गीता ही है, जिसमें ईश्वर के निर्गुण निराकार स्वरूप , एकेश्वरवरवाद का वर्णन है। अन्यत्र जगह पर भी स्वामी विवेकानंद ने साफ कहा है कि राम, शिव, या किसी भी एक ही देवता से हिंदू धर्म नहीं जुड़ता है।

यही कारण है कि अपनी मृत्यु से पहले वे उत्तराखंड के चंपावत जिले में मायावती नामक स्थान पर मार्च, 1899 में (यानि भाजपा, मोदी प्रायोजित रामराज्य या 2014 से भी 115 साल पहले ही) अद्वैत आश्रम की स्थापना करवाते हैं। यह उत्तराखंड के चंपावत जिले में है। लोहाघाट कस्बे से मात्र दस किलोमीटर दूर। और आगे बाबा नानक की उदासी के समय का श्री रीठा साहब गुरुद्वारा है।

शानदार जगह पर हैं। (मैं किसी कारण से चाह कर भी अभी तक मायावती में नहीं जा सका हूं।)

बल्कि अपने को 2014 से भी पहले से ही हिंदू मानने वाले भी नहीं जानते होंगे कि उस आश्रम को बनाने वाले को कौन थे? किसने उसका खर्च उठाया? वे थे स्वामी विवेकानंद के साथ भारत लौटे ब्रिटिश दंपति कैप्टन सेवियर और उनकी पत्नी, जिन्हें स्वामी विवेकानंद अपने माता-पिता के रूप में संबोधित करते थे। 

1900 में इन महात्मा श्रीमान सेवियर की मृत्यु होने पर स्वामी विवेकानंद पहली बार 1901 में मायावती पहुंचे थे और दो हफ्ते वहां रहे।श्रीमती सेवियर का निधन 1930 में हुआ था।

और सुनिये। बीस साल पहले उड़ीसा में पादरी के निर्दोष बच्चों को कार में जिंदा जला देने वाले, धर्म को बेचने वाले गिरोह के लोगो के पर्दाफाश हेतु एक और जानकारी बड़ी उपयोगी रहेगी। 

सितंबर, 1893 में शिकागो की धर्म सभा में कई भाषण देने के बाद एक समस्या आती है। स्वामी विवेकानंद के सामान्य से तीव्र गति में दिए जा रहे भाषणों को लिखने के लिए 1895 में एक विज्ञापन निकाला गया। इसके जवाब में एक ब्रिटिश अमेरिकी जे जे गुडविन ने आवेदन किया। जानिए कि आज 1895 से लेकर 1898 तक स्वामी विवेकानंद के जितने भी भाषण हैं उनको उनके लिए मुफ़्त स्टेनोग्राफर ही नहीं, मुफ्त में टाइपिस्ट का भी काम करने वाले गुडविन के भारतीय आभारी हैं।

हालांकि वे एक बहुत योग्य और महंगे स्टेनोग्राफर थे, परंतु केवल शुरू के एक हफ्ते तक ही उन्होंने इसके लिए पारिश्रमिक लेना स्वीकार किया। 

खैर, उसके बाद गुडविन केवल अपने जीवन निर्वाह के लिए स्वामी विवेकानंद के साथ कई देशों की यात्रा करते रहे। और स्वामी विवेकानंद के साथ ही उन्होंने भारत में प्रवेश किया। एक साइकिल से चलते थे , साधारण जीवन जीते थे ।दुर्भाग्य से बहुत शीघ्र ही ऊटी  में उनका निधन हो गया। 

उनके निधन पर स्वामी विवेकानंद ने उनको एक स्वरचित कविता भी समर्पित की थी। लेकिन 2014 के बाद हिंदू बने भक्तों का क्या जिक्र किया जाए?

खुद आरएसएस या बीजेपी के नेताओं में से किसी ने क्या मायावती में जाकर मिस्टर सेवियर को श्रद्धांजलि अर्पित की है? या मिस्टर गुडविन को श्रद्धांजलि दी है?

अगर इन तीन लोगों को भी छोड़ दें तो एक और तो भारतीय ही हैं जिन्होंने विवेकानंद की जान तब बचाई थी, जब वो विदेश में प्रसिद्ध भी नहीं हुए थे और अभी एक अनजाने, आम साधु का ही जीवन बिता रहे थे। उन महात्मा का नाम था अल्मोड़ा शहर के जुल्फिकार। जिनके पोते आज भी अल्मोड़ा में मात्र ₹500 में उसी कब्रिस्तान में जीवन बिता रहे हैं जहां पर एक शिला पर तीन दिन के भूखे प्यासे विवेकानंद बेहोश हो गए थे।

जुल्फिकार ने स्वामी विवेकानंद को जल पिलाकर और खीरा खिलाकर उनकी प्राण रक्षा की थी। उनके पड़पोते जागरणों में गाकर धन कमाते हैं।

क्या उस जान बचाने वाले मुसलमान ने जल पिलाकर गलत किया था? अधर्म किया था?

या फिर भगवान से ही गलती हो गई थी कि यह सब हुआ?

(डॉ उमेश चंदोला का लेख)

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